परिश्रम के पर्याय मिल्खा सिंह

यदि इरादों में जान है तो सब कुछ सम्भव है।वास्तव में मिल्खा सिंह का जीवन विकट परिस्थितियों में लक्ष्य की ओर समर्पण भाव से आगे बढ़ने वाला है, जो भारतीय खिलाड़ियों और सामान्य जनमानस के लिए प्रेरणापुंज हैं। भारत-पाक बंटवारे और माता पिता को खो देने का दर्द भी मिल्खा सिंह को लक्ष्य से नहीं ढिगा पाया। सीमित संसाधनों के बीच मेहनत के दम पर विशेष उपलब्धियां कैसे प्राप्त की जाती हैं इस बात के जीते जागते उदाहरण हैं फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह। * 1958 टोक्यो एशियाई खेलों में 200 मीटर और 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीतकर अपने परिश्रम का पराक्रम दिखाने वाले मिल्खा 1962 जकार्ता एशियाई खेलों में भी 400 मीटर और चार गुणा 400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुके हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा साल 1959 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। मिल्खा सिंह 1958 में पहले ऐसे भारतीय एथलीट बने जिन्होंने कार्डिफ कॉमनवेल्थ गेम में स्वर्ण पदक जीता था। मिल्खा सिंह ने 400 मीटर रेस में साउथ अफ्रीका के मैलकम स्पेंस को पछाड़ते हुए 46.6 सेकंड में दौड़ पूरी की थी। जबकि 200 मीटर रेस में उन्होंने पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को हराया था। मिल्खा ने यह दोड़ मात्र 21.6 सेकंड में पूरा किया था। ऐसी महान परिश्रम की मूरत मिल्नखा सिंह को कृतज्ञ राष्ट्र भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।

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