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वाराणसी का "रत्नेश्वर महादेव मंदिर"

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आध्यात्म और भक्ति से परिपूर्ण 84 घाटों वाली भगवान शिव की नगरी वाराणसी अपने आप में परिपूर्ण है किन्तु लगभग 400 वर्ष पुराना रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर यहां की प्रसिद्धि को चार चांद लगा देता है। विश्व प्रसिद्ध पीसा की मीनार मात्र 4° झुकी हुई है जबकि ये मन्दिर 9° झुका हुआ है जबकि ये गंगा नदी की तलहटी में बना हुआ है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित इस मन्दिर का निर्माण रानी अहिल्याबाई की दासी रत्नाबाई ने करवाया था। यहीं कारण है कि इस मंदिर का नाम दासी रत्नाबाई के नाम पर रत्नेश्वर महादेव मंदिर रखा गया। इस मन्दिर के झुका हुआ होने के बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं किन्तु विशाल ऊंचाई और वजन होने के बाद भी 9 डिग्री झुकाव पर टिका रहना आश्चर्य का विषय है। मां गंगा की तलहटी में होने के कारण यह मंदिर लगभग 8 से 9 माह तक जलभराव में ही रहता है और इस मंदिर का शिवलिंग जमीन से लगभग 10 फीट नीचे है। गुजरात शैली में बना स्तम्भों से युक्त संपूर्ण मंदिर नक्काशीदार पत्थरों से बना हुआ है जो देश और विदेशों तक एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थल बना हुआ है।

परिश्रम के पर्याय मिल्खा सिंह

यदि इरादों में जान है तो सब कुछ सम्भव है।वास्तव में मिल्खा सिंह का जीवन विकट परिस्थितियों में लक्ष्य की ओर समर्पण भाव से आगे बढ़ने वाला है, जो भारतीय खिलाड़ियों और सामान्य जनमानस के लिए प्रेरणापुंज हैं। भारत-पाक बंटवारे और माता पिता को खो देने का दर्द भी मिल्खा सिंह को लक्ष्य से नहीं ढिगा पाया। सीमित संसाधनों के बीच मेहनत के दम पर विशेष उपलब्धियां कैसे प्राप्त की जाती हैं इस बात के जीते जागते उदाहरण हैं फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह। * 1958 टोक्यो एशियाई खेलों में 200 मीटर और 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीतकर अपने परिश्रम का पराक्रम दिखाने वाले मिल्खा 1962 जकार्ता एशियाई खेलों में भी 400 मीटर और चार गुणा 400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुके हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा साल 1959 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। मिल्खा सिंह 1958 में पहले ऐसे भारतीय एथलीट बने जिन्होंने कार्डिफ कॉमनवेल्थ गेम में स्वर्ण पदक जीता था। मिल्खा सिंह ने 400 मीटर रेस में साउथ अफ्रीका के मैलकम स्पेंस को पछाड़ते हुए 46.6 सेकंड में दौड़ पूरी की थी। जबकि 200 मीटर रेस में उन्होंने पाकिस्तान के अब्दुल खालिक क...