चाणक्य "एक युगदृष्टा"

*सामान्य परिचय* : एक महान कूटनीतिज्ञ, विचारक, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, अध्यात्म शिरोमणि और एक मनीषी गुरु चाणक्य / विष्णुगुप्त का जन्म अनुमानतः 375 ईस्वी में एक अत्यन्त गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यद्यपि आचार्य चाणक्य के जन्म व जन्म स्थान तथा नाम को लेकर अनेक विद्वानों में मतभेद रहे हैं तथापि सर्वमान्य मत अर्थशास्त्र के प्रथम अनुवादक पंडित शामा शास्त्री ने कौटिल्य नाम का उच्चारण किया क्योंकि इनका जन्म कुटल गोत्र से मैं हुआ था अतः इनका नाम 'कौटल्य' माना जाता है। *कौटल्य इति गोत्रनिबन्धना विष्णु गुप्तस्य संज्ञा* कुछ विद्वानों का मत है कि इनका जन्म "चणक" निषाद के घर हुआ था इसलिए इनको चाणक्य नाम से जाना जाता है किंतु यह पूर्णत: सिद्ध है की चाणक्य /कौटिल्य एक ही व्यक्ति है इनको अन्य नाम विष्णुगुप्त वात्स्यायन, मलंग, द्रविमल ,अंगुल, कात्यायन वारानक आदि नामों से भी जाना जाता है *कौटिल्य की शिक्षा* आचार्य चाणक्य के लक्षण जन्म से ही सामान्य बालकों से अलग थे । वे जन्म से ही प्रखर बुद्धि वाले थे दूरदर्शी तथा दृढ़ निश्चयी थे। आचार्य चाणक्य की शिक्षा सिंधु नदी के किनारे (वर्तमान पाकिस्तान) तक्षशिला नामक विश्वविद्यालय में पूर्ण हुई। इनके पिता चाणक मुनि थे। वे भी एक शिक्षक थे। चाणक्य ने मात्र 26 वर्ष की आयु में राजनीति, अर्थशास्त्र ,समाजशास्त्र, ज्योतिष विज्ञान की शिक्षा पूर्ण कर ली तथा जिस उम्र में सामान्य बालक अध्ययन प्रारंभ करता है उस उम्र में आचार्य चाणक्य ने वेदों का अध्ययन तथा राजनीति के दाव पेच सीख लिए थे। *घनानंद से विरोध का कारण* : आचार्य चाणक्य के पिता चणक मुनि एक विद्वान शिक्षक थे। वे राष्ट्र की एकता अखंडता व सुरक्षा के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। तत्कालीन राजा घनानंद के क्रूर , निर्दयी और भोग विलासी होने के कारण उन्हें मगध का साम्राज्य असुरक्षित नजर आ रहा था अतः उन्होंने अपने मित्र "अमात्य शकटार" के साथ मिलकर मगध के सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई किंतु गुप्तचरों के माध्यम से यह सूचना राजा घनानंद को मिल गई और उन्होंने इस विद्रोह को शुरू होने से पहले ही रौंद दिया। उन्होंने चणक मुनि को बंदी बना लिया और उनको चौराहे पर फांसी दी गई तथा चणक मुनि के सिर को पूरे नगर में घुमाकर चौराहे पर टांग दिया गया। *चणक की राजद्रोह के षड्यंत्र में हत्या की जानकारी विशाखादत्त कृत मुद्राराक्षस से मिलती हैं* पिता की इस तरह निर्दयता और क्रूरता से हत्या से बालक कौटिल्य के मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी और कौटिल्य ने क्रूर शासक घनानंद के पापों का बदला लेने के लिए दृढ़ निश्चय हो गए। बहुत ही विकट परिस्थितियों में बालक कौटिल्य का पालन पोषण हुआ लेकिन उनके जीवन का ध्येयमात्र घनानंद से प्रतिशोध लेना ही था। एक दिन राजा घनानंद के द्वारा दरबार में विद्वानों की सभा के बीच चाणक्य को अपमानित किया गया तथा श्याम वर्ण के होने के कारण भी उनको तिरस्कृत किया गया। स्वाभिमानी और क्रोधी स्वभाव के होने के कारण आचार्य चाणक्य ने दरबार में ही घनानंद के द्वारा किए गए अपमान का प्रतिउत्तर इस प्रकार दिया:-"शिक्षक कभी साधारण नहीं होता राजन् प्रलय और निर्माण शिक्षक की गोद में पलते हैं"सत्ता के नशे में चूर होकर आपने एक ब्राह्मण का अपमान किया है और इस प्रकार बदला लेने की प्रतिज्ञा ठान ली और यह निश्चय किया कि अपनी शिखा की गांठ तब तक नहीं लगाउंगा जब तक कि इस अपमान का बदला ना ले लूंगा। *चंद्रगुप्त से भेंट* क्रोध से दनदनाते हुए ,मार्ग में आने वाले अवरोधों को रौंदते हुए कौटिल्य के अन्तर्मन में एक भयंकर ज्वाला धधक रही थी और बस एक ही ध्येय रह गया था कि शाम-दाम ,दण्ड - भेद मगध की सत्ता को पलट दी जाए। तभी "मार्ग में एक कुशा के शूल पर उनका पैर गया और उन शूलों ने चाणक्य के पैर में घुस कर लहूलुहान कर दिया। चाणक्य ने क्रोधित होकर उन कंटकों पर मठ्ठा डालकर समूल नष्ट कर दिया"। इस वृतांत से आंकलन किया जा सकता है कि वे कितने स्वाभिमानी,क्रोधी स्वभाव के थे। तत्पश्चात चाणक्य की दृष्टि कुछ खेलते हुए बच्चों पर गई।जो कि राज दरबार(राजकीलम) का खेल, खेल रहे थे। जिसमें राजा की भूमिका निभाने वाले एक नन्हे से बालक ने चाणक्य के मन में चल रहे विचार प्रवाह को एक नई दिशा दे दी। शांत मन से आचार्य चाणक्य ने उस बालक की न्याय पद्धति तथा राजा बनने की क्षमता को आंक लिया था और वे उस बच्चे के पास गए और उससे पूछा तुम्हारा नाम क्या है और तुम्हारे आचार्य का नाम क्या है?? निर्भीक बालक ने निडरता के साथ अपना नाम चंद्रगुप्त बताया और स्वयं को एक निम्न जाति से संबंध रखने वाला होने के कारण कोई आचार्य न होने कारण बताया। यह सुनकर चाणक्य के मन में आशा की एक किरण जाग उठी तथा बालक चंद्रगुप्त से कहा कि आज से मैं तुम्हारा आचार्य हूं और इस प्रकार आचार्य चाणक्य ने निम्न कुल में जन्मे चंद्रगुप्त का उपनयन संस्कार करवा कर उसे शिक्षा-दीक्षा प्रदान करने के लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय में ले जाने का प्रस्ताव रखा किंतु चंद्रगुप्त के मां की ममता तथा मामा का लोभी स्वभाव बालक के भविष्य में विघ्न डाल रहा था। अंततोगत्वा इन सभी अवरोधों से को पार करके आचार्य चाणक्य बालक चंद्रगुप्त को ले गए *चन्द्रगुप्त मौर्य की‌ शिक्षा* चाणक्य ने बालक चंद्रगुप्त को शस्त्र और शास्त्र की उन्नत और सुदृढ़ शिक्षा प्रदान की जिससे बालक चंद्रगुप्त के लिए बचपन से ही विषम और कठिन परिस्थितियों को सहन करना एक सामान्य बात थी।एक किवदंती के अनुसार चाणक्य ने चंद्रगुप्त को बचपन से ही भोजन में थोड़ा-थोड़ा विष देना प्रारंभ कर दिया था और धीरे-धीरे इस मात्रा को बढ़ाता गया किंतु यह बात चंद्रगुप्त को पता नहीं थी । एक दिन चंद्रगुप्त की गर्भवती पत्नी ने उस विषाक्त भोजन को खा लिया था जिससे वह काल के गाल में समां गई किंतु आचार्य चाणक्य ने गर्भस्थ शिशु को बचा लिया। *धनानंद का साम्राज्य एवं सेना* केन्द्र सत्ता के रूप में मगध का नन्दवंश तत्कालीन भारत का सबसे बड़ा और शक्तिशाली वंश था। जिसको विकास व उन्नति के शिखर पर पहुंचाने का काम महापद्मानन्द द्वारा किया गया। धनानंद को विरासत में एक विशाल राज्य और एक विशाल सेना मिली। यवन इतिहासकार लिखते हैं कि धनानंद की सेना में 2 लाख पैदल सैनिक , 20 हजार घुड़सवार, 2 हजार रथ और 3 हजार हाथी थे। नन्दों की इतनी भयंकर विशाल सेना के बारे में सुनकर ही सिकंदर इतना घबरा गया था कि उसने पोरस से युद्ध जीतने के बाद भी मगध पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया। *चन्द्रगुप्त का मगध पर आक्रमण* सर्वप्रथम आचार्य चाणक्य की सलाह एवं निर्देशन में चंद्रगुप्त के द्वारा मगध साम्राज्य में नगर के मध्य भाग में आक्रमण किया गया किंतु वह अपने इस पहले प्रयास में असफल रहे। अपनी इस हार से सीख लेते हुए उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों से मित्रता कर उन्हें अपने साथ मिलाया तथा मुख्य नगर के बाहर के छोटे-छोटे गढ़ों पर अधिकार करना प्रारंभ किया और देखते ही देखते नंद वंश को समाप्त कर धनानंद को सत्ता से विहीन कर दिया।

Comments

  1. बहुत ही सारगर्भित लेख...

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  2. बहुत अच्छा लेख

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    1. बहुत बहुत आभार खेमराज जी भाईसाहब 🙏

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  3. बेहद शानदार रवि जी..... अच्छी जानकारी
    ..👌

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    1. धन्यवाद सत्यजोग राव जी भाईसाहब 🙏

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  4. बहुत ही उम्दा जानकारी 👍👍

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  5. अति सुन्दर

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